कार्डियोमायोपैथी (Cardiomyopathy)

कार्डियोमायोपैथी 

परिभाषा (Definition):

Cardiomyopathy एक ऐसी बीमारी है जिसमें हृदय की मांसपेशियाँ (myocardium) कमजोर, मोटी या कठोर हो जाती हैं, जिससे हृदय की पंपिंग की क्षमता प्रभावित होती है।

प्रकार (Types):

1. Dilated Cardiomyopathy (DCM):

सबसे सामान्य प्रकार।

हृदय की मांसपेशियाँ कमजोर और पतली हो जाती हैं, जिससे हृदय का आकार बड़ा हो जाता है।

पंपिंग क्षमता कम हो जाती है।

कारण: शराब का अत्यधिक सेवन, वायरल संक्रमण, जेनेटिक कारण, ऑटोइम्यून डिजीज।

2. Hypertrophic Cardiomyopathy (HCM):

हृदय की मांसपेशियाँ (विशेषकर लेफ्ट वेंट्रिकल) असामान्य रूप से मोटी हो जाती हैं।

ब्लड फ्लो में रुकावट उत्पन्न होती है।

कारण: अनुवांशिक (Genetic), फैमिली हिस्ट्री।


3. Restrictive Cardiomyopathy (RCM):

हृदय की मांसपेशियाँ कठोर (rigid) हो जाती हैं।

हृदय में रक्त भरना कठिन हो जाता है।

कारण: Amyloidosis, Hemochromatosis, Radiation therapy।


4. Arrhythmogenic Right Ventricular Cardiomyopathy (ARVC):

राइट वेंट्रिकल की मांसपेशियाँ वसा और फाइब्रोस टिशू से बदल जाती हैं।

धड़कनें अनियमित हो जाती हैं।

कारण: आनुवंशिक विकार (Genetic disorder)।


लक्षण (Symptoms):

थकावट (Fatigue)

सांस फूलना (Dyspnea)

सीने में दर्द

बेहोशी (Syncope)

पैरों और टखनों में सूजन

अनियमित धड़कनें (Arrhythmia)

पंपिंग क्षमता कम होने से हृदय विफलता (Heart Failure) का खतरा


जांच (Investigations):

1. ECG: धड़कनों की अनियमितता।

2. Echocardiogram: हृदय की बनावट और कार्य का आकलन।

3. Chest X-ray: हृदय का आकार।

4. Cardiac MRI: detailed इमेजिंग।

5. Blood Tests: संक्रमण या अन्य विकारों की जांच।

6. Cardiac catheterization: कोरोनरी आर्टरी में ब्लॉकेज की जांच।

7. Genetic Testing: खासकर HCM और ARVC के मामलों में।


उपचार (Treatment):

1. दवाएँ (Medications):

ACE inhibitors (जैसे Enalapril)

Beta-blockers (जैसे Metoprolol)

Diuretics (पानी की गोली)

Antiarrhythmic drugs

Anticoagulants (blood thinner)


2. डिवाइस आधारित उपचार:

Pacemaker

Implantable cardioverter-defibrillator (ICD)

Left ventricular assist device (LVAD)


3. सर्जरी:

Septal Myectomy (HCM में)

Heart Transplant (अत्यधिक गंभीर मामलों में)


नर्सिंग मैनेजमेंट (Nursing Management):

1. Vitals की निगरानी करें।


2. रोगी को आराम दें और ओवरएक्टिविटी से बचाएँ।


3. Sodium-restricted और fluid-restricted डाइट का पालन कराएँ।


4. I/O चार्ट बनाए रखें।


5. ड्रग्स एडमिनिस्ट्रेशन में सावधानी बरतें।


6. रोगी को बीमारी और जीवनशैली बदलाव के बारे में शिक्षित करें।


7. इमरजेंसी लक्षणों की पहचान सिखाएँ – जैसे सांस फूलना, बेहोशी।


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