सिजोफ्रेनिया एक मनोरोग है जो किसी व्यक्ति में मानसिक विकार के बारे में बताता है। इस विकार से ग्रस्त व्यक्ति को वास्तविकता या फिर अपनी बात जाहिर करने में परेशानी होती है और ये सामाजिक व व्यावसायिक दोनों ही प्रकार से परेशानी का सामना करते हैं। सिजोफ्रेनिया से पीड़ित व्यक्ति आम तौर पर बिना सोचे समझे कुछ भी कहने और भ्रम जैसी दुविधा में जीते हैं। हालांकि सिजोफ्रेनिया को एक दुर्लभ स्थिति माना जाता है
• सिजोफ्रेनिया के लक्षण
सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों में अलग-अलग प्रकार के लक्षण हो सकते हैं। यह अपने आप आ सकते हैं या फिर खुद-ब-खुद चले भी जाते हैं। इसके अलावा पूरे जीवनकाल में ये लक्षण केवल दो या तीन बार हो सकते हैं। इस रोग की शुरुआत में, लक्षण अचानक और गंभीर भी हो सकते हैं। साइकोटिक फेज के दौरान रोगी वास्तविकता को कई हिस्सों में समझ सकता है।
1-पीड़ित व्यक्ति को देखने, सुनने, महसूस करने या कुछ चीजों की गंध आएगी लेकिन वो वास्तविक नहीं होती हैं।
2-भ्रम की स्थिति रहती है, जहां अजीब चीजें महसूस होती हैं, जो बिल्कुल झूठी होती हैं।
3-पीड़ित व्यक्ति के मन में ख्याल अचानक एक से दूसरी जगह पर चला जाता है।
4-मौजूदा हालात के साथ उचित भावनाओं, विचारों और मनोदशा का महसूस न होना।
सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोगों को ये चीजें भी अनुभव होती हैंः
1-एक वक्त में बहुत सारी ऊर्जा दिखाना या फिर कैटाटैनिक बनना। ये एक ऐसी अवस्था है जिसमें शरीर बहुत कठोर हो जाता है।
2-ऐसी चीजें बोलना, जिसके बारे में समझ ही नहीं होना। 3-हाथ-पैर धोना और खुद को सही तरीके से बनाकर रखना।
4-खुद को अलग-थलग रखना।
5-कार्यस्थलों, जहां भीड़-भाड़ हो, वहां पर कार्य करने या अन्य गतिविधियों को करने की क्षमता खो देना।
6-जीवन में कम रुचि दिखाना।
7-अवसाद के लक्षण दिखाई देना या मूड में बदलाव होना। 8-शारीरिक रूप से निष्क्रिय होना।
• सिजोफ्रेनिया के कारण और जोखिम कारक
सिजोफ्रेनिया का कारण सिजोफ्रेनिया का कोई एक कारण नहीं है। ऐसा माना जाता है कि इस स्थिति के पीछे पर्यावरण और आनुवंशिक जैसे कुछ कारक योगदान देते हैं। सिजोफ्रेनिया के पीछे मुख्य कारण आनुवांशिक होता है और इस स्थिति के लिए मानसिक बीमारी से पीड़ित रोगी के रिश्तेदार भी इसी बीमारी से पीड़ित देखे जाते हैं। हालांकि, अन्य न्यूरोलॉजिक्ल कारक भी हैं जो इस स्थिति में योगदान देते हैं। सिजोफ्रेनिया की शुरुआत और रिकवरी में मनोवैज्ञानिक और परिवार का माहौल भी भूमिका निभा सकता है।
पुरुषों में ये रोग आमतौर पर 10 से 25 वर्ष की आयु के बीच पाया जाता है जबकि महिलाओं में यह स्थिति 25 से 35 वर्ष की आयु के बीच अधिक आमतौर पर देखने को मिलती है।
मादक पदार्थों का सेवन भी सिजोफ्रेनिया का एक महत्वपूर्ण कारण हो सकता है। वे लोग, जो नशा करते हैं उनमें नशा नहीं करने वालों की तुलना में सिजोफ्रेनिया का जोखिम छह गुना अधिक होने की संभावना रहती है।
• सिजोफ्रेनिया का निदान
इस स्थिति का पता लगाने का कोई निश्चित मेडिकल टेस्ट नहीं है। सिजोफ्रेनिया का पता रोगी की केस हिस्ट्री और उसके मानसिक हालात को देखकर ही लगाया जाता है। इस रोग का पता लगाने के लिए फुल साइकेट्रिक इवैल्युशेन, मेडिकल हिस्ट्री का मूल्यांकन और फिजिकल टेस्ट किए जाते हैं। मरीज में किसी प्रकार के लक्षणों का पता लगाने के लिए लैब परीक्षणों का उपयोग भी किया जाता है।
सिजोफ्रेनिया का पता लगाने के लिए रोगी में कम से कम 30 दिनों तक निम्न लक्षणों में से दो या उससे अधिक लक्षण मौजूद होने चाहिए:
1-बुरे-बुरे सपने आना
2-भ्रम की स्थिति रहना
3-बोलने में दिक्कत होना
4-कैटाटैनिक व्यवहार
5-नकरात्मक या फिर उदासीन शब्दों का प्रयोग
-काम या स्कूल में अन्य लोगों से संबंधित महत्वपूर्ण समस्याएं, या खुद की देखभाल करने में समस्या।
कम से कम एक महीने तक सक्रिय लक्षणों के साथ बीते छह महीने से सिजोफ्रेनिया के लक्षण दिखाई देना
-भले ही कोई अन्य स्वास्थ्य समस्या न हो लेकिन नशे की लत या फिर मानसिक स्वास्थ्य विकार भी लक्षणों का कारण बनता है।
• सिजोफ्रेनिया का इलाज
अगर शुरुआत में ही इस रोग की पहचान और उसे कंट्रोल किया जाए तो सिजोफ्रेनिया का उपचार काम आ सकता है। दवाओं के साथ सामाजिक और सामुदायिक सपोर्ट उपचार में प्रभावी साबित होता है। मरीजों को अस्पताल या फिर मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में भेजने से इस रोग को बढ़ने से रोकने में मदद मिल सकती है। परिवार के सदस्यों का सपोर्ट भी रोग को बढ़ने से रोकने में बहुत उपयोगी साबित होता है। सिजोफ्रेनिया के लिए दी जाने वाली दवा आमतौर पर बुरे सपने, भ्रम, सनक और भ्रमित सोच जैसे मनोविकार के लक्षणों को कम करने में मदद करती है।
सिजोफ्रेनिया के लिए फार्माकोथेरेपी को विकसित हुए वर्षों बीत चुके हैं और सिजोफ्रेनिया के उपचार के लिए बेहद प्रभावी दवाइयां उपलब्ध हैं। यह दवाइयां मनोचिकित्सा के साथ-साथ प्रेरणा की कमी, अभिव्यक्ति की कमी और सामाजिक जुड़ाव में कमी जैसे लक्षणों का इलाज करने के लिए भी उपयोगी साबित होती है। ये थेरेपी तनाव को कंट्रोल कर और कम्युनिकेशन को बेहतर बनाने के साथ-साथ जीवन कौशल को बेहतर बनाने में भी मददगार साबित होती है। कभी-कभी ग्रुप थेरेपी समान लक्षण वाले समूह को आपस में जोड़कर भी मदद करती है। जीवनशैली में इन बदलावों को कर सिजोफ्रेनिया से उबरने में मिलती है मदद सामाजिक सपोर्ट भी है बहुत जरूरी रोगी को शांत करने और तनाव को कम करने के लिए उसे मित्रों और परिवार के साथ जुड़ने के लिए तरीके सुझाएं। अपने दैनिक कार्यों को जारी रखते हुए दूसरों के साथ जुड़े रहना भी लाभदायक सिद्ध होता है। सामान्य दिखने वाले लोगों के साथ समय बिताने से भी फायदा मिलता है।
सिजोफ्रेनिया से पीड़ित लोग जुड़े रहने से अपने बारे में अच्छा महसूस करते हैं। तनाव को प्रबंधित करना सीखें शरीर के कोर्टिसोल हार्मोन के उत्पादन को बढ़ाकर सिजोफ्रेनिया के कारण होने वाले तनाव को कम करने में मदद मिलती है। तनाव कम करने के लिए रिलैक्सेशन प्रैक्टिस भी काफी मददगार साबित होती है। एक्सरसाइज करें एक्सरसाइज, फोकस और ऊर्जा को बढ़ाने और रोगियों को शांत महसूस करने में मदद करती है।
चलने, दौड़ने, तैरने, या डांस करने जैसी गतिविधियां मात्र दिन में 30 मिनट करने से लक्षणों को कम करने में मदद मिलती है। उचित नींद लें नियमित नींद चक्र मूड को फ्रेश बनाए रखने में मदद करता है। रोगी को आठ घंटे से अधिक की नींद की सलाह दी जाती है। नशे के सेवन से बचें ड्रग्स, निकोटीन और अल्कोहल सिजोफ्रेनिया के लक्षणों को बढ़ाने में मदद कर सकती है। इतना ही नहीं ये कुछ दवाओं के उपचार के रास्ते में भी बाधा पैदा करती हैं। हेल्दी खाने की आदत बनाएं फिश ऑयल, अखरोट और फ्लैक्ससीड्स से मिलने वाला ओमेगा -3 फैटी एसिड आपके ध्यान को बेहतर बनाने, थकान से बचने और मूड को संतुलित करने में मदद कर सकते हैं। सही अंतराल पर भोजन और पौष्टिक खाद्य पदार्थों को डाइट में शामिल कर शरीर में पर्याप्त पोषण बनाए रखने में मदद मिल सकती है।

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